FANDOM

१२,२७७ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng
































CHANDER

हम थे तुम थे साथ नदी थी
पर्वत पर आकाश टिका था
झरनों की गति मन हरती थी
रुकी-रुकी कोहरे की बाहें
हरियाली की शीतल छांहें
रिमझिम से भीगे मौसम में
सन्नाटे की धुन बजती थी
मणिमुक्ता से साँझ सवेरे
धुली-धुली दोपहर को घेरे
हाथों को बादल छूते थे
बूँदों में बारिश झरती थी
गहरी घाटी ऊँचे धाम
मोड़ मन्नतें शालिग्राम
झरझर कर झरते संगम पर
खेतों से लिपटी बस्ती थी
गरम हवा का नाम नहीं था
कहीं उमस का ठाम नहीं था
खेतों सजी धान की फसलें
अंबर तक सीढ़ी बुनती थीं

Community content is available under CC-BY-SA unless otherwise noted.