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                कविता : - (अनाथ-बच्चे)
             कल रात मेरी क़लम ये कहते हुए रोयी,
             उन मज़लूम बेबस बच्चों की आवाज सुने कोई,

दिन-भर उनकी आँखें खाने को तरसती रही, खाना तो नहीं पर गालियाँ मिलती रही,

             दो वक़्त का निवाला उनको नसीब तक नहीं, 
             ऐसे में उन बच्चों की आवाज सुनें कोई, 

घनघोर रजनी में भी उनकी आँखें सोई नहीं, एक नवीन आशा के साथ ख़्वाब देखती रही,

             इंतजार की घड़ियाँ भी लंबी हो गई, 
             इसी बीच उनकी आँखें भी लग गई, 

सुबह होते ही पलकों को प्रकाश की किरणें छूँ गई, मानों असीम संताप के साथ अक्षि भी खुल गई,

           चाहते हैं पढ़ना मगर मुक़म्मल किताबें ही नहीं, 
           वक़्त गुजरता है पर रहने को आशियाँ ही नहीं, 

विद्यालय जाने की उनकी भी अभिलाषा होगी, लेकिन उनकी आवाज सुनी किसने होगी,

            सरकार ऐसे बच्चों को करती है नज़र अंदाज, 
            और ऊपर से कहती है बढ़ रहे हैं बाल अपराध, 

कल रात मेरी क़लम ये कहते हुए रोयी, उन मजलूम बेबस बच्चों की आवाज सुने कोई......

                                 ताहिर हुसैन (युवा-कवि)
                                   १९ सितंबर,२०१८
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