Hindi Literature
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" नहीं हुआ कोई संयोजन , जीवाश्म हो चूका था हर प्रायोजन

मरू से मरुस्थल हो चूका था , कृति से आकृति बोल रहा था

तोड़ दिया न जाने किसने ? आसमान मानो मुंह खोल रहा था

टूट कर गिर न जाये ?पाषाण अब अपनी भाषा बोल रहा था "

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