१२,२८० Pages

उबलने की ओर अग्रसर इंडिया

- राजकुमार सोनी

आने वाले सालों में भारत में तापमान इतना होगा कि लोग खुद को उबलता हुआ महसूस करने लगेंगे। वजह यह कि यहां के वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा सीमा लांघ चुकी है। इसकेचलते धूप के चलते धरती से निकलने वाली विकिरणें अवशोषित हो जा रही है और वायुमंडल में नहीं जा रहीं। बीते सौ साल के तापमान के विश्लेषण में 0.40 डिग्री सेल्सियस तापमान बढऩे की बात सामने आई है।

तीन डिग्री तक बढ़ सकता है तापमान बीते तीन दशक में अकेले यह बढ़ोत्तरी करीब 0.2 डिग्री सेल्सियस की रही। यही रेट रहा तो फिर वर्ष 2100 तक तापमान में तीन से चार डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हो सकती है। बीएचयू के भूभौतिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. ज्ञानप्रकाश सिंह के निर्देशन में जारी अहम शोध के क्रम में छात्र आरके मौर्या ने यह तथ्य पाए हैं। विश्लेषण में पाया गया कि बीते सौ साल में दिन का तापमान 0.65 जबकि रात का तापमान 0.40 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। देश के सात हिस्सों में बांटकर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि इस दौरान तापमान सबसे ज्यादा पश्चिमी तट में 0.67 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है जबकि सबसे कम उत्तर पश्चिम भारत में 0.07 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ा है। इसी तरह पश्चिम हिमालय में 0.53, उत्तर मध्य भारत में 0.41, उत्तर पूर्व भारत में 0. 55, पूर्वी तट में 0.42 और इंटेरियल पेनिनसुएला में 0.45 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है।

कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा अधिक वजहों की तलाश में डा. सिंह ने पाया है कि वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 380 पार्ट पर मिलियन बाइ वाल्यूम (पीपीएमवी) हो गई है जिसकी सीमा 280 पीपीएमवी ही है। यह बीते तीन दशकों में बढ़े वाहनों से निकलने वाले धुएं और बिजली उत्पादन के क्रम में उडऩे वाले कार्बन के चलते हुआ है। काफी कम पर अहम पहलू रेफ्रिजरेटर से निकलने वाले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन भी हैं। ये ओजोन परत को क्षीण करने में लगे हैं।

तत्काल राहत के लिए विकल्प वाहनों के यूरोपीय लेवल वाले या यूरो फोर स्तर वाले ईंधनों का प्रयोग हो। पेट्रोल या डीजल में निजी मुनाफेके लिए मिलावट पर पूरी तरह पाबंदी हो। मकानों पर सफेद रंग वाली पेटिंग कराएं, ये विकिरण को कम अवशोषित करते हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर आज न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में चिन्ता निरन्तर गहरा रही है। दरअसल मौसम की मार अब किसी खास महीने में अथवा किसी खास देश पर देखने को नहीं मिल रही बल्कि मौसम की यह मार हर जगह, हर कहीं साल दर साल लगातार बढ़ रही है बल्कि अब तो ऐसा लगने लगा है, जैसे हर मौसम अपनी मारक क्षमता दिखाने के लिए ही आता है। गर्मी में जहां पारा 47-48 डिग्री तक जा पहुंचता है, वहीं सर्दियों में यह अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में भी लोगों को बुरी तरह कंपकंपा जाता है और बरसात में कहीं इस कदर बारिश होती है कि लोग बाढ़ की विभीषिका झेलने को विवश हो जाएं तो कहीं लोग वर्षा ऋतु में भी एक-एक बूंद पानी को तरसते दिखाई पड़ते हैं और अकाल की नौबत आ जाती है।

एकाएक ठंड बढ़ी कुछ वर्ष पूर्व जनवरी माह के शुरू में खासतौर से उत्तर भारत में मौसम ने जो सितम ढाया था, उससे हर कोई हतप्रभ था। तब दिल्ली में जहां पारे ने 0.2 डिग्री पर पहुंचकर 70 साल का रिकार्ड ध्वस्त कर दिया था, वहीं कश्मीर की डल झील इस कदर जम गई थी कि लोगों ने उस पर जमकर क्रिकेट खेला, कुछ अन्य हिस्सों में पारा शून्य डिग्री से भी नीचे पहुंच गया था तो ठंडी जगह माने जाने वाले शिमला में उसी दौरान तापमान छह डिग्री दर्ज किया गया था। तब एक ओर जहां एकाएक बढ़ी ठंड ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर जान-माल को काफी नुकसान पहुंचाया था, वहीं जनवरी के दूसरे पखवाड़े में मौसम बहुत काफी गर्म रहा था। इसे मौसम का बिगड़ता मिजाज नहीं तो और क्या माना जाए?

कैटरीना और रीटा तूफान अमेरिका में कैटरीना और रीटा नामक तूफानों के चलते हुई भयानक तबाही, भारतीय उपमहाद्वीप में आया विनाशकारी भूकम्प, भारत में इस वर्ष कई राज्यों में आई भयानक बाढ़, क्या इन्हें भी प्रकृति का प्रकोप ही नहीं माना जाएगा? अंटार्कटिका में पिघलती बर्फ और वहां उगती घास ने भी सबको हैरत में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन यह सब हमारे दुष्कृत्यों का ही नतीजा है क्योंकि प्रकृति से हमारी छेड़छाड़ जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है तथा पर्यावरण संतुलन को हमने बुरी तरह बिगाड़ दिया है। हमारी लापरवाहियों का ही नतीजा है कि भूगर्भीय जल भी अब दूषित होने लगा है और बढ़ते प्रदूषण के चलते जहरीली गैसें 'एसिडÓ की बरसात करने लगी हैं। पृथ्वी का निरन्तर बढ़ता तापमान और जलवायु में लगातार हो रहे भारी बदलाव आज किसी एक देश के लिए नहीं बल्कि समूचे विश्व में मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। मौसम का बिगड़ता मिजाज मानव जाति, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए तो बहुत खतरनाक है ही, पर्यावरण संतुलन के लिए भी एक गंभीर खतरा है। हालांकि प्रकृति बार-बार अपने प्रकोप, अपनी प्रचंडता के जरिए हमें इस ओर से सावधान करने की भरसक कोशिश भी करती है पर हम हैं कि लगातार इन खतरों की अनदेखी किए जा रहे हैं। पर्यावरण का संतुलन जिस कदर बिगड़ रहा है, ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बचपन से ही हमें पर्यावरण की हानि से होने वाली गंभीर समस्याओं के बारे में सचेत किया जाए और यह सिखाया जाए कि हम अपने-अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में या भागीदारी निभा सकते हैं।

तेजी से आ रहा बदलाव विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 10 हजार वर्षों में भी पृथ्वी पर जलवायु में इतना बदलाव और तापमान में इतनी बढ़ोतरी नहीं देखी गई, जितनी हाल के कुछ ही वर्षों में देखी गई है। मौसम के इस बदलते मिजाज के लिए औद्योगिकीकरण, बढ़ती आबादी, घटते वनक्षेत्र, वाहनों के बढ़ते कारवां तथा तेजी से बदलती जीवनशैली को खासतौर से जिम्मेदार माना जा सकता है। 'ग्लोबल वार्मिंगÓ की विकराल होती समस्या के लिए औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाली हानिकारक गैसें, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं, जिनका वायुमंडल में उत्सर्जन विश्वभर में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से काफी तेजी से बढ़ा है।


सूर्य की तेज किरणों का प्रभाव पृथ्वी तथा इसके आसपास के वायुमंडल का तापमान सूर्य की किरणों के प्रभाव अथवा तेज से बढ़ता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने के बाद इनकी अतिरिक्त गर्मी वायुमंडल में मौजूद धूल के कणों एवं बादलों से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में लौट जाती है। इस प्रकार पृथ्वी के तापमान का संतुलन बरकरार रहता है लेकिन कुछ वर्षों से वायुमंडल में हानिकारक गैसों का जमावड़ा बढ़ते जाने और इन गैसों की वायुमंडल में एक परत बन जाने की वजह से पृथ्वी के तापमान का संतुलन निरन्तर बिगड़ रहा है। दरअसल हानिकारक गैसों की इस परत को पार करके सूर्य की किरणें पृथ्वी तक तो आसानी से पहुंच जाती हैं लेकिन यह परत उन किरणों के वापस लौटने में बाधक बनती है और यही पृथ्वी का तापमान बढ़ते जाने का मुख्य कारण है।

जिस प्रकार वनस्पतियों के लिए (पौधों के शीघ्र विकास के लिए) बनाया जाने वाला 'ग्रीन हाउसÓ (शीशे का घर) सूर्य की ऊर्जा को इस ग्रीन हाउस के अंदर तो आने देता है लेकिन ऊष्मा को बाहर नहीं निकलने देता और परिणामत: ग्रीन हाउस के भीतर का तापमान काफी बढ़ जाता है, ठीक उसी प्रकार वायुमंडल में विभिन्न जहरीली गैसों की एक परत बन जाने से वह परत भी इस ग्रीन हाउस की भांति सूर्य की गर्मी को परत को पार करके पृथ्वी तक जाने तो देती है लेकिन वापस नहीं लौटने देती। इसी वजह से इस प्रक्रिया को 'ग्रीन हाउस इफैक्टÓ कहा जाता है और हानिकारक गैसों की इस परत को 'ग्रीन हाउस लेयरÓ तथा इस परत के निर्माण में सक्रिय गैसों को 'ग्रीन हाउस गैसÓ कहा जाता है।

ग्रीन हाउस गैस खतरनाक मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों में 'क्लोरो फ्लोरो कार्बनÓ परिवार की गैसें शामिल हैं, जो औद्योगिक इकाइयों में बड़ी मात्रा में उपयोग की जाती हैं। इन गैसों में कोयले, पेट्रोल, डीजल, तेल, जीवाश्म ईंधन आदि से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस सर्वाधिक खतरनाक 'ग्रीन हाउस गैसÓ मानी जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार 1960 के बाद से ही वायुमंडल में इस गैस की मात्रा में 25 फीसदी वृद्धि हुई है। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ते जाने के साथ-साथ ज्यों-ज्यों वायमुंडल में ग्रीन हाउस लेयर की मोटाई बढ़ती जा रही है, पृथ्वी का तापमान भी उसी के अनुरूप लगातार बढ़ रहा है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछली सदी के दौरान वर्ष दर वर्ष पृथ्वी का तापमान बढ़ता रहा और पिछली सदी का अंतिम दशक तो विगत 1000 से भी अधिक वर्षों के मुकाबले बहुत ज्यादा गर्म रहा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में कोई भी जलवायु परिवर्तन इतनी तीव्र गति से नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी 50 वर्षों तक पर्यावरण प्रदूषण और पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी की यही गति जारी रही तो इस सदी के मध्य तक इस तापमान में 3 से 5 डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि हो सकती है और ऐसा हुआ तो 'महाप्रलयÓ की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान 2.8 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढऩे की संभावना है।

अंकुश लगाना जरूरी इसलिए यदि समय रहते ग्रीन हाउस गैसों के वायुमंडल में उत्सर्जन पर अंकुश न लगाया गया तो आने वाले वर्षों में इसके बहुत विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। इससे विश्व भर में मौसम का संतुलन बुरी तरह डगमगा जाएगा और ऋतुओं का आपसी संतुलन बिगड़ जाने से एक प्रकार से महाप्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। पृथ्वी पर वायुमंडल का तापमान निरन्तर बढ़ते जाने से हिमशिखर पिघलते जाएंगे और इस तरह बर्फ पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा तथा समुद्र तल ऊंचे उठने व जलस्तर बढऩे के कारण एक ओर जहां समुद्रों के किनारे बसे अनेक शहर जलमग्न हो जाएंगे, वहीं बाढ़ की विभीषिका भी उत्पन्न होगी तथा कृषि योग्य भूमि निरन्तर घटती जाएगी। इस प्रकार दुनिया भर में अकाल जैसी भयानक समस्या के सिर उठाने से करोड़ों लोग भूखे मरने के कगार पर पहुंच जाएंगे।

समस्या विकराल बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग की समस्या जिस प्रकार निरन्तर विकराल होती जा रही है और मौसम के इस बदलते मिजाज का खामियाजा भी चूंकि विकसित देशों के बजाय विकासशील देशों को ही अधिक भुगतना पड़ता है, अत: विकासशील देशों को चाहिए कि वे अमेरिका सरीखे विकसित देश पर इस बात के लिए दबाव बनाएं कि वह प्रकृति के विरूद्ध अपनी छेड़छाड़ बंद कर पर्यावरण सुधार की मुहिम में अपना भी महत्वपूर्ण योगदान दे।

ग्लोबल वार्मिग से बचाएगी ग्रीन एल्गी तेजी से बढ़ते धरती के तापमान से दुनिया में ग्लोबल वार्मिग की समस्या बढ़ रही है। इससे निपटने के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की है। अब एल्गी से ग्लोबल वार्मिग के खतरे को टाला या फिर पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। अंटार्कटिका व उसके आसपास के क्षेत्रों में काम कर रही वैज्ञानिकों की टीम ने पाया है कि बर्फ के पिघलने से वहां आइरन के तत्व विकसित हो रहे हैं। आइरन के ये तत्व एल्गी का निर्माण करते हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड गैस को सोखते हैं। इसके साथ ही ये पृथ्वी के लिए खतरा बन रही अन्य ग्रीन हाउस गैसों को भी सैकड़ों सालों तक सोखने में सहायक हैं।

एल्गी समुद्र की निचली सतह ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया कि ग्रीन एल्गी समुद्र की निचली सतह पर ही कार्बनडाई ऑक्साइड गैस को निकलने से रोक सकती है। टीम का कहना है कि इस प्रक्रिया से धरती का बढ़ता तापमान नियंत्रित होगा। वैज्ञानिकों के प्रमुख प्रोफेसर रॉब रैसवेल, लीड यूनिवर्सिटी, ने कहा कि पृथ्वी खुद ही हमें बचाने का प्रयास कर रही है। इस नई जानकारी के आधार पर अब वैज्ञानिक इस महीने के अंत में दक्षिण जॉर्जिया के द्वीप पर एक परीक्षण करने जा रहे हैं। इसमें कई टन आर्टीफीशियल आइरन सल्फेट के जरिए यह परखा जाएगा कि इससे कितनी एल्गी बनती है और कार्बनडाई ऑक्साइड गैस के उत्सर्जन पर कितना प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक इस बात पर तो निश्चिंत हैं कि समुद्र में आइरन की मात्रा बढ़ाने से एल्गी पैदा होगी लेकिन जहरीली गैसों पर कितना नियंत्रण होगा इसका अंदाजा नहीं है। पार्यवरणविदों ने उन्हें आगाह किया है कि यदि यह प्रयोग असफल रहता है तो इतनी अधिक संख्या में समुद्र में आर्टीफीशियल आइरन डालने से ईको सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है। पिछले साल ब्रिटेन ने दक्षिणी महासागर में इस तरह के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। मगर चूंकि अब यह परिवर्तन प्रातिक रूप से हो रहा है तो उम्मीद है कि इस बार यह प्रयोग सफल होगा।

क्या है ग्लोबल वार्मिग पृथ्वी के औसतन तापमान में वृद्धि को ग्लोबल वार्मिग कहते हैं। ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढऩे से पृथ्वी में गर्मी बढ़ रही है और इसके फलस्वरूप हिम खंड पिघल रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड, कार्बनमोनो ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों को ग्रीन हाउस गैस कहते हैं। उद्योगो व कारों से निकलने वाला धुआं, पॉलीथिन और कचरा जलाने के बाद निकले वाली गैसें पर्यावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।

क्या है ग्रीन एल्गी एल्गी समुद्र में रहने वाले ऐसे जीवधारी होते हैं जो पौधों की तरह दिखाई देते हैं। पौधों की श्रेणी में ग्रीन एल्गी सबसे पुरानी है। इसके विकास के करीब 500 अरब वर्ष बाद धरती पर पौधों की उत्पत्ति हुई। जिस तरह धरती पर पौधे कार्बनडाइ ऑक्साइड को ग्रहण करने के साथ ही पर्यावरण में ऑक्सीजन का निर्गमन करते हैं, ठीक वैसे ही एल्गी समुद्र के अंदर काम करती है। यह धरती के तापमान को कम करने में सहायक है।


21 वीं सदी तक मिट सकता है वजूद दुनिया की 60 करोड़ की आबादी का वजूद 21 वीं सदी की शुरुआत तक मिट सकता है। इसकी वजह है ग्लोबल वॉर्मिंग (धरती का बढ़ता तापमान)। ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते इस समय समुद्र का स्तर पिछले 2,100 सालों में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है और 21 वीं सदी तक समुद्र में पानी का स्तर 190 सेंटी मीटर तक बढऩे की आशंका है। वैज्ञानिकों का दावा है कि समुद्र का स्तर 50 सेंटी मीटर बढऩे से ही दुनिया के 60 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं। समुद्र में पानी के बढ़ते स्तर पर अध्ययन से जुड़ी एक रिपोर्ट 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेजÓ में छपा है। रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम में शामिल प्रोफेसर स्टीफन रमस्टॉर्फ का कहना है कि हमारी स्टडी और अनुमान के मुताबिक सन 1990 से सन 2100 के बीच समुद्र का स्तर 75-190 सेंटी मीटर तक बढ़ जाएगा। अमेरिका के उत्तरी कैरोलाइना में किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि समुद्र में पानी का स्तर हर साल 2 मिली मीटर के हिसाब से बढ़ रहा है। 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेजÓ में छपी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईसा पूर्व सन 200 से सन 1,000 एडी तक समुद्र के स्तर में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई थी। लेकिन इसके बाद समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी हुई। निचले इलाकों में निवास उधर, जॉन चर्च नाम के वैज्ञानिक ने समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी का इंसानों पर असर को लेकर एक स्टडी की थी। इस स्टडी के मुताबिक समुद्र के स्तर में 50 सेंटी मीटर की बढ़ोतरी दुनिया की दस फीसदी आबादी के वजूद पर संकट खड़ा करने के लिए काफी है। जॉन का कहना है कि दुनिया के करीब 60 करोड़ लोग धरती के निचले इलाकों में रहते हैं। समुद्र का स्तर बढऩे से इनके जीवन पर सबसे पहले संकट आने की आशंका है। इन अध्ययनों से साफ है कि 21 वीं सदी तक धरती के निचले इलाकों में रहने वाली आबादी के वजूद पर गंभीर संकट है। पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी में सी लेवल रिसर्च लेबोरेटरी के निदेशक बेंजामिन हॉर्टन का कहना है कि समुद्र में पानी का स्तर बढऩा मौसम में बदलाव का नतीजा है क्योंकि बढ़ते तापमान के चलते धरती पर मौजूद बर्फ पिघल रही है समुद्र का पानी गर्म हो रहा है।

मालदीव के वजूद पर संकट भारत के पड़ोस में मौजूद मालदीव के वजूद पर ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते गंभीर संकट है। मालदीव में सरकारी एजेंसियां इस नतीजे पर पहुंची हैं कि वहां समुद्र का स्तर 0.9 सेंटी मीटर की दर से हर साल बढ़ रहा है। 1,200 द्वीपों के इस देश में 80 फीसदी द्वीप समुद्र स्तर से एक मीटर की ही ऊंचाई पर ही मौजूद हैं। ऐसे में अगले 100 सालों में ही मालदीव के 3.60 लाख लोग इस देश को छोडऩे पर मजबूर हो जाएंगे।

All items (21)

A
D
K
R
S
U
Community content is available under CC-BY-SA unless otherwise noted.