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जो शाश्वत प्रकृति है उसमें पहाड़ है उनकी चट्टानों, पत्थरों में बार-बार उगते पेड़ और वनस्पतियाँ हैं।

वहाँ मैं जा रहा हूँ

वहाँ ऐसा एकांत हिमांचल है कि कोई पहले गया न हो वे मनुष्य की राह देख रहे हैं।

वे पर्वत, श्रेणियों में उसी तरह स्थिर हैं जैसे चित्र खिंचवाने के लिए एक समूह होता है बाहर उनके बीच एक मेरी जगह है वहाँ मैं स्थिर हो जाऊँगा क्या?

मैं स्थिर नहीं होऊँगा घूमूँगा, दौडूँगा, हँसूगाँ , चिल्लाऊँगा, रोऊँगा ....


इस एकांत में पहाड़ों को यह याद न आए कि एक समय था जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे।

शायद उन्हें वह समय याद आ रहा हो जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे।

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