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बारे ग़म-ए-फ़िराक़ उठाता रहा हूँ मैं
 
 
शम्अ' जला जला के बुझाता रहा हूँ मैं
 
 
सारे-जहाँ को दिल से भुलाता रहा हूँ मैं
 
 
बस याद तेरी दिल में बसाता रहा हूँ मैं
 
 
दीवार-ओ-दर के दिल के नज़र के ख़याल के
 
 
हर आइने से ख़ुद को छुपाता रहा हूँ मैं
 
 
नज़रें उठा के देख भी ले इक नज़र मुझे
 
 
ऐ दोस्त तेरी बज़्म में आता रहा हूँ मैं
 
 
बढ़ता रहे शबाब ये हर रोज़ हर घड़ी
 
 
आईना बन के तुझ को सजाता रहा हूँ मैं
 
 
इस शहर-ए-बे-वफ़ा में जफ़ाओं के बा'द भी
 
 
'अर्पित' वफ़ा के फूल खिलाता रहा हूँ मैं
 
 
इस इश्क़ में दरकार कहानी है ज़रूरी
 
 
तुम ज़ख़्म अता कर दो निशानी है ज़रूरी
 
 
इक बात है जो तुझ को बतानी है ज़रूरी
 
 
पर ज़ेहन में मेरे भी तो आनी है ज़रूरी
 
 
कितना ही घना क्यूँ न हो अब राह का जंगल
 
 
लेकिन मिरी मंज़िल मुझे पानी है ज़रूरी
 
 
ख़ुश्की पे हवा रहने न देगी कोई मंज़र
 
 
आँखें हैं मिरे पास तो पानी है ज़रूरी
 
 
मिरे दुख का तू अंदाज़ा लगा दे
 
 
ख़ुशी को अपनी ख़ुद ही तू मिटा दे
 
 
हवा इतराए फिरती हैं जो ख़ुद पर
 
 
अगर हिम्मत हो सूरज को बुझा दे
 
 
सितारे सिसकियाँ भरते है शब-भर
 
 
कभी तो आँख भी ग़म का पता दे
 
 
दिल-ए-बीमार को रश्क-ए-मसीहा
 
 
जो हो महबूब अब ऐसी दुआ दे
 
 
मुक़ाबिल से चला ये कौन उठकर
 
 
के जैसे शम-ए-दिल कोई बुझा दे
 

१४:५२, नवंबर १६, २०१८ के समय का संस्करण

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